भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने “द लल्लनटॉप” को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में उन गंभीर आरोपों का जवाब दिया है, जिनमें कहा गया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) और सांप्रदायिकता (Communalism) को बढ़ावा दिया।
इंटरव्यू के दौरान उनसे यह सवाल राजनीतिक वैज्ञानिक प्रताप भानु मेहता की एक टिप्पणी के आधार पर पूछा गया, जिसमें कहा गया था कि —
“अगर किसी कास्टिंग डायरेक्टर को मोदी युग के लिए एक मुख्य न्यायाधीश चुनना होता, तो वह चंद्रचूड़ से बेहतर उम्मीदवार नहीं पाता।”
मेहता ने आरोप लगाया था कि जिस तरह पीएम मोदी ने लोकतांत्रिक ढांचे का इस्तेमाल अपने उद्देश्यों के लिए किया, उसी तरह जस्टिस चंद्रचूड़ ने “उदार संवैधानिकता” के नाम पर बहुसंख्यकवाद को वैध ठहराया।
“यह उनकी राय है, समाज की नहीं” — पूर्व CJI का जवाब
इस सवाल पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने संयमित लेकिन दृढ़ जवाब देते हुए कहा:
“वह अपनी राय रखने के हकदार हैं। यह समाज और भविष्य को तय करना है कि वे विचार सही हैं या नहीं।”
उन्होंने आगे कहा कि वे अपने बचाव में नहीं बोल रहे हैं, लेकिन उनके कई निर्णय इस बात का उदाहरण हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुसंख्यकवाद के खिलाफ खड़े होकर फैसला दिया।
पूर्व CJI ने गिनाए अपने बहुचर्चित फैसले
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निजता का अधिकार (पुट्टस्वामी केस):
उन्होंने याद दिलाया कि अदालत ने साफ किया था कि निजता कोई “अभिजात्य अवधारणा” नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है — चाहे वह झुग्गी में क्यों न रहता हो। -
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) केस:
अपनी रिटायरमेंट से ठीक पहले, उनकी पीठ ने AMU का अल्पसंख्यक दर्जा बहाल किया। -
महिलाओं की स्वायत्तता (हादिया केस):
उन्होंने कहा कि अदालत ने यह निर्णय दिया कि “हर महिला को अपनी बॉडी और माइंड पर पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।” -
गर्भपात का अधिकार:
सुप्रीम कोर्ट ने विवाहित और अविवाहित महिलाओं के लिए समान गर्भपात अधिकार सुनिश्चित किए। -
भीमा कोरेगांव केस:
उन्होंने बताया कि उस मामले में उनका निर्णय “डिसेंट” (असहमति) में था — जो बहुमत के विपरीत खड़ा था। -
दलित छात्र का IIT एडमिशन:
एक दलित छात्र को फीस में देरी के कारण प्रवेश से वंचित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद छात्र को एडमिशन दिया गया।
“हम कोई मुगल शासक नहीं हैं”
जस्टिस चंद्रचूड़ ने जोर देकर कहा कि न्याय धर्म या समुदाय के आधार पर नहीं, बल्कि विधि के अनुसार दिया जाता है।
“यह कोई मुगल शासन नहीं है कि जो मन में आए वही न्याय दे दिया जाए। हमें कानून के अनुसार निर्णय देना होता है।”
प्रताप भानु मेहता की राय पर अंतिम टिप्पणी
पूर्व CJI ने कहा:
“प्रताप भानु मेहता जी की जो राय है, वह उनकी व्यक्तिगत राय है। मैं नहीं मानता कि यह समाज की राय है।”
उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास और समाज खुद तय करेंगे कि कौन-से विचार सही थे और कौन-से नहीं।
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