शरिया की आड़ में मनमानी? तालिबान को खटकती औरतों की आज़ादी

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ती जा रही है। शरिया कानून के नाम पर लागू की जा रही पाबंदियाँ महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। यह आलेख तालिबान शासन के तहत महिलाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों और उनके मानवाधिकारों पर पड़ने वाले प्रभावों की समीक्षा करता है।


तालिबान शासन में महिलाओं की स्थिति

तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति में गंभीर गिरावट आई है। महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक जीवन और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित किया गया है। उन्हें पुरुष अभिभावक के बिना घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं है, और उन्हें बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। महिलाओं द्वारा लिखी गई किताबों पर प्रतिबंध लगाया गया है, और विश्वविद्यालयों में महिला अध्ययन और मानवाधिकार जैसे पाठ्यक्रमों को हटाया गया है। यह सब शरिया कानून के नाम पर किया जा रहा है।


अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और देशों ने तालिबान के इन कदमों की आलोचना की है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। हालांकि, तालिबान ने इन आलोचनाओं को नजरअंदाज किया है और अपने फैसलों को शरिया कानून के तहत उचित ठहराया है।


सऊदी अरब से तुलना

सऊदी अरब, जो इस्लामी दुनिया का एक महत्वपूर्ण देश है, ने महिलाओं के अधिकारों में सुधार की दिशा में कई कदम उठाए हैं। 2018 में महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति दी गई, और 2021 में महिलाओं को बिना पुरुष अभिभावक के यात्रा करने की आज़ादी मिली। इसके विपरीत, तालिबान शासन महिलाओं को बुनियादी अधिकारों से भी वंचित कर रहा है, जो इस्लामी सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है।


निष्कर्ष

तालिबान शासन के तहत अफगान महिलाओं की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है। शरिया कानून के नाम पर लागू की जा रही पाबंदियाँ महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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